Saturday, 4 January 2025

manjil hai maut

 मंजिल है मौत


हम कहाँ जा रहे है

किधर जा रहे है

मंजिले का पता नहीं

लक्ष्य की खबर नहीं

बस आगे बढ़ने की धुन में

नर्म दूर्वा को रौंदकर

कांटे सजा रहे है

गुलाबों को काटकर

नागफनी लगा रहे है

अब जरूरत नहीं

इस दुनिया में इंसान की

कुर्सी की पूजा है

पूजा नहीं प्रान की

एक का बिन दूजा अधूरा

न सुख न दुःख

न फांसी न सलीब

न विरह न प्रीत

न धनी न गरीब

जीवन के बाद आती हैं

मृत्यु की बलाहटें

इंसानियत जी चुकी

सुनी हैवानियत की आहटें

इंसान दौड़ रहा है

तेजी से भाग रहा है

बड़े, बड़े आविष्कारों से

कहने केा जाग रहा है

परंतु सच बताओ

क्या सच ही वह बढ़ रहा है

या आदिम युग की ओर


लौट कर मुड़ रहा है

ईमानदारी जिंदा है

यह भी खबर है

जो ईमानदार है

बेहद लचर है।

नागफनी के जंगल

बस जंगल रह जायेंगे

चिड़ियों के संगीत की 

चहक नही

महक का पता नही

एक तीखी सी गंध

जीवन में बस जायेगी

कांटे ही कांटे चुभते

रह जायेंगे 

चुभना नियति है

हमारा क्या है हम तो

दुनियाँ से चले जायेंगे

आने वाली पीढ़ी को

मौत के कगार पर बिठा

दुनियाँ में रोशन

नाम तो कर जायेंगे

नाम तो रोशन कर जायेंगे


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