मंजिल है मौत
हम कहाँ जा रहे है
किधर जा रहे है
मंजिले का पता नहीं
लक्ष्य की खबर नहीं
बस आगे बढ़ने की धुन में
नर्म दूर्वा को रौंदकर
कांटे सजा रहे है
गुलाबों को काटकर
नागफनी लगा रहे है
अब जरूरत नहीं
इस दुनिया में इंसान की
कुर्सी की पूजा है
पूजा नहीं प्रान की
एक का बिन दूजा अधूरा
न सुख न दुःख
न फांसी न सलीब
न विरह न प्रीत
न धनी न गरीब
जीवन के बाद आती हैं
मृत्यु की बलाहटें
इंसानियत जी चुकी
सुनी हैवानियत की आहटें
इंसान दौड़ रहा है
तेजी से भाग रहा है
बड़े, बड़े आविष्कारों से
कहने केा जाग रहा है
परंतु सच बताओ
क्या सच ही वह बढ़ रहा है
या आदिम युग की ओर
लौट कर मुड़ रहा है
ईमानदारी जिंदा है
यह भी खबर है
जो ईमानदार है
बेहद लचर है।
नागफनी के जंगल
बस जंगल रह जायेंगे
चिड़ियों के संगीत की
चहक नही
महक का पता नही
एक तीखी सी गंध
जीवन में बस जायेगी
कांटे ही कांटे चुभते
रह जायेंगे
चुभना नियति है
हमारा क्या है हम तो
दुनियाँ से चले जायेंगे
आने वाली पीढ़ी को
मौत के कगार पर बिठा
दुनियाँ में रोशन
नाम तो कर जायेंगे
नाम तो रोशन कर जायेंगे
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