एक पुजारी जी
एक धर्माधिकारी जी
एक संत चमत्कारी जी
एक मठाधीश महाराज
और पीछे पीछे एक
बालों में उंगलिया फिराता
आँखों में लाचारी
चेहरे की बड़ी दाढ़ी
मटमैला कुरतापाजामा
आँखें कहीं और खींचे
पहुँचे चित्रगुप्त के दरबार में
चित्रगुप्त ने दाढ़ी पर हाथ फिराया
अपना चश्मा सरकाया
पुजारीजी को देखा
हाँ आप मंदिर प्रमुख थे
‘हँू ,क्या धर्म का काम किया खुद बतायें
ईश्वर को कब याद किया?
पुजारीजी मुस्कराये
महाराज भगवान् की तो करता था सेवा
भगवान् को उठाने से सुलाने तक
उनको खिलाता था मेवा
भक्तों को कराता था दर्शन
मैं और मेरे भगवान् यही मेरा नाता
चित्रगुप्त ने चश्मे से झांका
‘अरे पुजारी भेंट को करता था ताका
किसने चढ़ाया कितना माल
अमीरों को प्रसाद
गरीबों को देता था टाल
तेरा घ्यान तो रहता था चढ़ावे में
दर्शक को रखता था भुलावे में
चढ़ावे को कहाँ कहाँ छिपाया
भगवान् ने बही में लिखवाया
एक किनारे खड़ा होजा
मांगना किस्मत में लिखा है
दूतों को किया इशारा
नरक के द्वार पहुँचाओ
आओ धर्माधिकारीजी आप भी
कितनों को धर्म का मार्ग दिखाया
आपका भी चिट्ठा जाये बताया
मैं मैं तो धर्मका पालन करता था
आदर्श और धर्म की राह पर चलता था
केवल जपता उसका नाम था
भजन करना मेरा काम था
‘हाँ हर मंदिर में पीछे तेरा कमरा था
जहाँ महिलाओं को धर्म सिखाता था
कहिये संत चमत्कारी जी
आप तो खुद को भगवान् बताते थे
कृष्ण के रास वाला रूप दोहराते थे
इधर उधर गोपियाँ खड़ी रखते थे
भक्त भगवान् को नहीं उन्हें तकते थे
भगवान् का नाम तो भूल जाते
उन सुंदरियों में रम जाते
आप रस लेले कर कथा सुनाते
महिलाआंे से चरण दबवाते थे
भगवान् तक भक्त कहाँ पहुँच पाते
आप उनके रास्ते में आ जाते
आप भी खड़े हो जाइये उस तरफ
अगली महान् आत्मा को आने दो इस तरफ
महाराज मठाधीश जी गिड़गिड़ाये
मैं एकतरफ खड़ा हूँ कुछ न बतायें
हर मंदिर के चढ़ावे में तेरा हिस्सा था
तेरा गद्दा दिन ब दिन ऊँचा उठता था
सब धर्मों को लड़ाना ही तेरा काम था
नफरत फैले तभी तो होता मेरा नाम था
सुनकर मठाधीश लगे काँपने
रामनामी दुप्पट्टे से लगे मुँह ढाँपने
चित्रगुप्त उनकी पतली हालत देख मुस्कराये
महाराज मठाधीश जी हाथ जोड़ गिड़गिड़ाये
मैं एक तरफ खड़ा हँू कुछ न आगे बतायें
चित्रगुप्त ने उस दुबले पतले को बुलाया
उसने चित्रगुप्त के साथ अपना चश्मा चढ़ाया
चित्रगुप्त ने बही और शख्स ने डायरी खोली
रुकिये चित्रगुप्तजी घबड़ाये
अपने दूतों से कहा इन्हें सीधे स्वर्ग पहँुचायें
इनके लिये स्वर्ग से रथ तुरंत मंगवायें
पुजारी संत मठाधीश धर्माधिकारी चकराये
यह तो अदना सा कवि है सहमा सहमा
मूरख प्राणी तुम क्या जानो इनकी महिमा
तुम दर्शकों दर्शन कम अधिक भगाते
ये अपनी कविता सुनाकर न जाने
कितनों को भगवान् याद कराते ।